जानिए, संत बनने के बाद अंगुलीमाल के साथ क्या हुआ? - धर्म संसद
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जानिए, संत बनने के बाद अंगुलीमाल के साथ क्या हुआ?

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बुद्ध की शिक्षाओं ने अंगुलीमाल पर जादू किया। लोगों की हत्या कर उनके उंगलियों की माला पहन लेने वाला अंगुलीमाल साधु हो गया। उसने कटार फेंक कर भगवा धारण कर लिया और हाथ में भिक्षापात्र ले लिया, पर अंगुलीमाल को साधु के रूप में कौन स्वीकार करता। उसने सैकड़ों लोगों की हत्याएं की थी। लोगों को लूटा था। उसका नाम ही अपने आप में आतंक था। बुद्ध ने अंगुलीमाल को नया नाम दिया था। अहिंसक। अंगुलीमाल तो क्रूर डाकू से अहिंसक हो गया।

बुद्ध की शिक्षाओं को अपना कर उसने अपने हृदय से सारी नफरत निकाल फेंकी और प्रेम और अहिंसा को अपना लिया। वह अकेले ही भिक्षापात्र लेकर निकल पड़ता था। जो लोग उसे नहीं पहचानते, वे लोग उसके चरण छूकर आशीर्वाद लेते और उसके प्रवचन सुनते, पर धीरे-धीरे उसकी पहचान भी खुल गई। आम लोगों को पता चल गया कि यह जो अहिंसक नाम का साधु सब को अहिंसा, ईमानदारी, सत्य, नशे से मुक्ति और व्याभिचार से दूर रहने की शिक्षा दिए फिरता है, यह तो अंगुलीमाल है। इसने ही सैकड़ों लोगों का खून किया है।

लोग उस पर पत्थर फेंकते, लाठियों से मारते

धीरे-धीरे चारों ओर यह बात फैल गई। अब अंगुलीमाल जिधर भी जाता, लोग उस पर पत्थर फेंकते। उसे लाठियों से मारते। दुत्कारते। भगा देते, पर अहिंसक बन चुका अंगुलीमाल कोई प्रतिरोध नहीं करता था और सबकुछ सहता रहता था और अपने ऊपर अत्याचार करने वालों को भी आशीर्वाद देता रहता। एक बार एक साथी भिक्षु ने अंगुलीमाल से पूछा कि सब तुम्हारा इतना अपमान करते हैं। इतना भरा-बुला बोलते हैं। तुम पर पत्थर भी फेंकते हैं। तुम्हें मारते भी हैं। तुम तो अब भी इतने ताकतवर हो, तुम सब कैसे सह लेते हो।

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अंगुलीमाल ने दिया यह उत्तर

अंगुलीमाल ने कहा कि जब बुद्ध ने मुझे हिंसा की राह छोड़ने के लिए कहा था, तो मैंने उनसे कहा था कि लोग मुझे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। लोग मेरे ऊपर पत्थर फेंकेंगे। मुझे मारेंगे। जानते हो मित्र। इसके उत्तर में बुद्ध ने क्या कहा था। बुद्ध ने कहा था कि बस इतना ही। तुम्हारे साथ इससे भी बुरा हो सकता है और जो भी होगा, उसके लिए तुम्हारे कर्म ही जिम्मेवार होंगे। अगर तुम वीर हो। अगर तुममें अपने बुरे कर्मों को अच्छे कर्मों ने नष्ट करने का साहस है, तो क्या होगा, इसकी चिंता छोड़ धर्म के मार्ग पर चलो। मैंने सारी चिंताएं छोड़ दी हैं। मुझे अब कोई भय नहीं। सिर्फ एक चिंता रहती है कि धर्म की राह एक क्षण के लिए भी न छूट जाए।

साधु अंगुलीमाल पर एक दिन हुआ जानलेवा हमला

एक दिन अंगुलीमाल के साथ भिक्षाटन करने जाने वाला भिक्षु दौड़ता हुआ बुद्ध के पास आया। उसने बुद्ध को बताया कि कुछ लोग अंगुलीमाल को घेरकर पीट रहे हैं। लगता है आज उसकी जान ही ले लेंगे। अहिंसक (अंगुलीमाल) है कि वहां से भाग भी नहीं रहा। किसी को कुछ कह भी नहीं रहा, बस चुपचाप सबकी लाठियां और पत्थर खा रहा है। भिक्षु की बात सुनकर बुद्ध तुरंत वहां पहुंचे, जहां साधु अंगुलीमाल को पीटा जा रहा था। बुद्ध ने वहां पहुंचकर देखा कि अंगुलीमाल के शरीर से खून बह रहा है, पर उसके चेहरे पर अब भी मुस्कान है और हर लाठी व पत्थर के बाद वह कह रहा है कि आप सब का कल्याण हो। आप सब प्रसन्न रहें।

बुद्ध ने पूछा, यह अंगुलीमाल होता, तो तुमलोग थर-थर कांप रहे होते

यह देखकर बुद्ध ने वहां मौजूद लोगों से पूछा कि अंगुलीमाल यह है या तुमलोग। इसमें आज भी इतना सामर्थ्य है कि अगर यह अहिंसक नहीं होता, तो तुम लोग इस पर लाठी चलाना तो दूर इसे उंगली भी नहीं लगा पाते। इसके भय से तो तुमलोग थर-थर कांपते थे। आज इसके शरीर से बह रहे रक्त ने यह साबित कर दिया कि अंगुलीमाल पूरी तरह साधु हो गया है। बुद्ध की बात सुनकर वहां मौजूद सारे लोगों ने लाठियां फेंक दी और बुद्ध के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे।

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महिला ने सबको सुनाई साधु अंगुलीमाल की महानता की कहानी

तभी वहां एक छोटे से बच्चे के साथ एक महिला आई और आकर साधु अंगुलीमाल के चरणों को छूकर प्रणाम किया। भीड़ उस महिला को देखने लगी, तो महिला ने कहा कि यह कितने बड़े महात्मा हैं। यह मैं बताती हूं। कुछ महीने पहले मेरी बैलगाड़ी बुद्ध के आश्रम के पास से होकर गुजर रही थी। तभी मुझे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। जंगल में कोई नहीं था, जो मेरी मदद करता। मेरे साथ केवल मेरी मां और गाड़ीवान था। तभी साधु अंगुलीमाल वहां आए। मेरी हालत इतनी खराब हो गई थी कि मेरी मां भी मेरे बचने की उम्मीद छोड़ चुकी थी।

मैं प्यास से तड़प रही थी, पर वहां जल भी नहीं था। मेरी हालत देखकर साधु अंगुलीमाल ने अपने भिक्षापात्र का जल मुझे पिलाया और आकाश की ओर हाथ उठाकर कहा कि हे ईश्वर, अंगुलीमाल से अहिंसक बनने के बाद मैंने एक क्षण के लिए भी धर्म नहीं छोड़ा। मैंने अहिंसक बनने के बाद जितने भी अच्छे कर्म किए हैं। मैं अपने उन सारे अच्छे कर्मों का फल इस महिला को देता हूं। इसकी और बच्चे की जान बचा लो ईश्वर। इसके बाद चमत्कार हुआ। मेरी हालत ठीक होने लगी और मैंने इस बच्चे को जन्म दिया। मेरे बेटे और मेरी जान इन्हीं साधु अंगुलीमाल के त्याग के कारण बच सकी। इन्होंने अपने सारे अच्छे कर्मों का फल मुझे दे दिया था।

अंगुलीमाल के चरणों में गिर पड़े लोग

महिला की बात सुनकर अंगुलीमाल पर पत्थर फेंकने और लाठियां मारने वाली भीड़ साधु अंगुलीमाल (अहिंसक) के चरणों में गिर पड़ी। उस दिन के बाद से अंगुलीमाल की ख्याति एक साधु के रूप में बढ़ती ही चली गई और उन्हें बुद्ध के सबसे महान शिष्यों में एक माना जाने लगा।

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