यह संत न मिलते, तो ईसाई बन गए होते गांधी, जानिए पूरी कहानी - धर्म संसद
shrimad rajchandra
Image Courtesy: indoamerican-news.com

यह संत न मिलते, तो ईसाई बन गए होते गांधी, जानिए पूरी कहानी

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आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिवस है। महात्मा गांधी और भारत को कभी अलग नहीं किया जा सकता। महात्मा गांधी ने नए भारत पर जितना प्रभाव डाला, उतना प्रभाव शायद ही किसी दूसरे व्यक्ति ने डाला हो, पर मोहनदास करमचंद गांधी यूं ही महात्मा गांधी नहीं बन गए। उन्हें निर्माण की पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। कई लोग उनके निर्माण में सहायक बने, पर उनके व्यक्तित्व पर सबसे ज्यादा जिस संत का प्रभाव पड़ा। उनका नाम है श्रीमद राजचंद्र।

श्रीमद राजचंद्र न होते, तो शायद मोहनदास करमचंद गांधी ईसाई धर्म अपना चुके होते। श्रीमद राजचंद्र ने जिन्होंने महात्मा गांधी से एक सीधा सा सवाल पूछा। श्रीमद राजचंद्र ने गांधी से पूछा कि क्या तुम्हारे मन में ईश्वर को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उनके उत्तर तुमने हिंदुत्व में और हिंदुत्व के ज्ञान में ढूंढ़ने की कोशिश की। और क्या इसके बाद भी तुम्हें तुम्हारे प्रश्नों के जवाब नहीं मिले। तुम पहले हिंदुत्व को पढ़ लो। अच्छे से समझ लो। उसके बाद भी अगर तुम्हारा झुकाव ईसाई या किसी दूसरे धर्म की ओर हो, तो तुम जरूर उस धर्म को अपना लो।

मोहनदास से महात्मा बन गए गांधी

श्रीमद राजचंद्र महात्मा गांधी से मात्र दो वर्ष बड़े थे, पर उनकी बातों का गांधीजी पर ऐसा असर हुआ कि उन्होंने हिंदुत्व पढ़ना और समझना शुरू किया। जब मोहन दास ने हिंदुत्व को पढ़ा और समझा, तो धीरे-धीरे इस ज्ञान की रोशनी में वे मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी हो गए।

श्रीमद राजचंद्र ने ही गांधी को दी थी अहिंसा की सीख

महात्मा गांधी ने श्रीमद राजचंद्र के बारे में कई बार लिखा है और अपने लेखों में उनका जिक्र किया है। यहां तक कि कहा जाता है कि अहिंसा का जो हथियार उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और भारत में अंग्रेजों के खिलाफ प्रयोग किया, उसकी प्रेरणा भी गांधीजी को श्रीमद राजचंद्र से ही मिली थी।

33 वर्ष की आयु में हो गया था निधन

1901 में 33 वर्ष की आयु में श्रीमद राजचंद्र का निधन गुजरात के राजकोट में हो गया और तब से ही महात्मा गांधी ने ब्रह्मचर्य का व्रत धारण कर लिया। गांधीजी ने श्रीमद राजचंद्र के बारे में लिखा है कि मेरे अनुसार वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ भारतीय थे।

गांधीजी अक्सर पत्रों के माध्यम से श्रीमद राजचंद्र से बात किया करते थे और ईश्वर व धर्म से जुड़े सवाल पूछते थे। गांधीजी ने हिंदुत्व को पढ़ने के बाद दूसरे धर्मों का भी खूब अध्ययन किया, पर हिंदुत्व का जो अमृत उन्हें एक बार मिल गया, उससे वे फिर कभी एक क्षण के लिए भी अलग नहीं हो सके।

बकरी का दूध पीने के पीछे की कहानी

श्रीमद राजचंद्र ने एकबार पत्र भेजकर महात्मा गांधी से कहा था कि मोहनदास, तुम जानवरों के दूध पीना छोड़ दो। पशुओं का दूध पीकर कभी पशुओं की प्रवृति (पशुता) से मुक्त नहीं हुआ जा सकता। महात्मा गांधी को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की वजह से डॉक्टर्स ने दूध पीने की सलाह दी, पर श्रीमद राजचंद्र की शिक्षा के अनुसार दूध मांसाहारी भोजन की श्रेणी में आता था। उनके मुताबिक मनुष्य को अपनी मां के अलावा और किसी का दूध पीने का कोई अधिकार नहीं है, पर डॉक्टर्स के बहुत जोर देने पर महात्मा गांधी ने बकरी का दूध पीने का फैसला किया। फिर महात्मा गांधी पूरा जीवन सिर्फ बकरी का ही दूध पिया करते थे।

‘महात्मा नो महात्मा’

श्रीमद राजचंद्र को महात्मा गांधी रायचंद भाई कहा करते थे। वे दक्षिण अफ्रीका में सबको श्रीमद राजचंद्र की किताब आत्म सिद्धि पढ़ने के लिए कहते थे। श्रीमद राजचंद्र को गुजरात में ‘महात्मा नो महात्मा’ कहा जाता था। मतलब महात्मा गांधी के महात्मा। महात्मा गांधी ने श्रीमद राजचंद्र का जिक्र अपनी किताब आत्मकथा सत्य के प्रयोग में कई बार किया है।

पिछले साल पीएम ने जारी किया डाक टिकट

महात्मा गांधी के आध्यात्मिक गुरु श्रीमद राजचंद्र के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल साबरमती में डाक टिकट और सिक्का जारी किया। महात्मा गांधी और श्रीमद राजचंद्र की पहली मुलाकात 1891 में मुंबई में हुई थी। इसके बाद महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका चले गए पर श्रीमद राजचंद्र और महात्मा गांधी के बीच पत्रों से बातचीत होती रही। गांधीजी ने श्रीमद राजचंद्र को उल्लेख अपने गुरु के रूप में कई बार किया है। गांधीजी ने लिखा है कि अहिंसा की शक्ति से उनका परिचय श्रीमद राजचंद्र ने ही कराया था। श्रीमद राजचंद्र का निधन 33 वर्ष की आयु में ही हो गया था। महात्मा गांधी को लंबे समय तक उनका साथ नहीं मिल सका, पर श्रीमद राजचंद्र को हमेशा भारत को गांधी देने का श्रेय मिलता रहेगा।

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