तीन देशों के डॉक्टर्स की रिसर्च रिपोर्ट, रोगों से मुक्ति दिलाता है गीतापाठ - धर्म संसद
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तीन देशों के डॉक्टर्स की रिसर्च रिपोर्ट, रोगों से मुक्ति दिलाता है गीतापाठ

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पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत के सीनियर डॉक्टर्स की टीम के रिसर्च के बाद इंडियन जर्नल ऑफ एन्डोक्रनालजी एंड मेटाबॉलिज्म में जो स्टडी प्रकाशित हुई है, उसमें बताया गया है श्रीमद्भगवद्गीता डायबिटीज सहित कई खतरनाक बीमारियों से दूर रहने या लड़ने में सहायक सिद्ध होता है। जिन डॉक्टर्स की टीम ने इस रिसर्च में हिस्सा लिया है, उनमें ढाका कॉलेज एंड हॉस्पिटल (बांग्लादेश) और आगा खान यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल, कराची पाकिस्तान के डॉक्टर्स भी शामिल हैं। यह रिसर्च कहता है कि श्रीमद्भगवद्गीता एक धार्मिक ग्रंथ और दार्शनिक किताब से बहुत आगे की चीज है।

गीता के 700 से ज्यादा श्लोक जीवन की हर स्थिति में जीना सिखाते हैं और इनका उपयोग किसी देश या राज्य के लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लोग इसके ज्ञान का लाभ उठा सकते हैं। गीता के श्लोक यह तक बताते हैं कि भोजन कैसे करना चाहिए। व्यायाम (एक्सरसाइज) कैसे करना चाहिए और सबसे बड़ी बात यह है कि इस बारे में जो बातें गीता में बताई गई हैं, वे पूरी तरह साइंटिफिक हैं।

बीमारी के बारे में पता लगने पर बिल्कुल अर्जुन की तरह हो जाती है मरीज की हालत

रिसर्च टीम लिखती है कि जिस तरह की स्थिति युद्धक्षेत्र में रिश्तेदारों को सामने देखकर अर्जुन की हुई थी। जैसे अर्जुन जैसे महाधनुर्धर के हाथ से उनका धनुष (गांडीव) गिर गया था। मुंह सूखने लगा था। शरीर थरथराने लगा था। शरीर के सारे बाल जैसे खड़े हो गए थे। आंखों में आंसू आ गए थे। मुंह से ठीक से आवाज नहीं निकल रही थी। वैसी ही हालत किसी व्यक्ति की तब होती है, जब उसे पता चलता है कि उसे कोई गंभीर बीमारी है। उसे पूरा जीवन बेकार लगने लगता है। जीवन के प्रति उत्साह खत्म होने लगता है।

आसान हो जाएगा बदलावों को अपनाना

कई लोगों को जब डॉक्टर्स यह बताते हैं कि आप ये चीजें अब नहीं खा पाएंगे। यह नहीं कर पाएंगे। आपको ये एहतियात बरतने होंगे,  तो लोग बुरी तरह से टूटने लगते हैं। ऐसी स्थिति में जो गीता पढ़ेगा, वह इस स्थिति का हंसते-मुस्कुराते सामना कर लेगा। वह बीमारियों की वजह से जीवन में आए नए बदलावों को आसानी से अपना लेगा। वह अपनी सबसे प्रिय खाने की चीजों को बहुत आसानी से छोड़ देगा और दुखी भी नहीं रहेगा। उसमें संयम आ जाएगा। अपने ऊपर नियंत्रण बढ़ जाएगा।

इस रिसर्च के मुताबिक हर तरह की बीमारी से लड़ने में गीता से अच्छा साथी दूसरा कुछ और नहीं हो सकता। साथ ही डॉक्टर्स के लिए भी गीता मददगार साबित हो सकता है। अगर डॉक्टर्स गीता पढ़ेंगे, तो वे भी अपने मरीजों को उसी तरह से बीमारियों के कारण आने वाली परेशानियों का सामना करने के लिए तैयार कर सकेंगे, जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को लड़ने के लिए तैयार किया था।

भ्रम में फंस जाता है मरीज, करता है उल्टा काम

इस रिसर्च में डॉक्टर्स लिखते हैं कि जैसे अर्जुन को यह अच्छी तरह पता था कि उसके रिश्तेदार जिनके खिलाफ उसे युद्ध करना है, वे अन्याय के साथ खड़े हैं। गलत के साथ खड़े हैं, पर इसके बावजूद उसका मन अपने रिश्तेदारों के मोह में फंस गया था, वैसे ही मरीज भी जानते हुए भी कि यह खाने से उसे नुकसान होगा। यह करने से उसे फायदा होगा। उल्टा काम करता है। वह एक तरह से भ्रमजाल में फंसा होता है। अगर मरीज गीता पढ़ेगा, तो उसका भ्रमजाल बिखर कर रह जाएगा और फिर वह वही खाएगा, जो उसे खाना चाहिए। वही करेगा, जो उसे करना चाहिए। चाहे वह मजेदार हो या बुरा महसूस कराने वाला और ऐसा करते हुए व न तो गुस्से में रहेगा और ना ही तनाव में।

किसी चीज के बिना बेकार नहीं हो जाती जिंदगी

रिसर्च में डॉक्टर्स लिखते हैं कि कई लोग कहते हैं कि अगर अब मैं यह खाना नहीं खा पाऊंगा। यह काम नहीं कर पाऊंगा, तो फिर जीवन का क्या मतलब रह जाएगा। फिर तो जीवन ही बेकार है। ऐसी जिंदगी से तो मौत ही अच्छी है। इस स्थिति में मरीज की अगर कोई मदद कर सकता है, तो वह है श्रीमद्भगवद्गीता।

डिप्रेशन से बचाता है गीता, जोश भरता है, जीने की उम्मीद देता है

गीतापाठ डिप्रेशन में जाने से बचाता है। गीता निगेटिव मूड (नकारात्मकता) से मुक्ति दिलाता है। क्रोध और उदासी से दूर ले जाता है। मरीज अगर गीता न पढ़ रहा हो, तो उसके परिवार के सदस्य भी गीता पढ़कर उसका ज्ञान मरीज के साथ बांट सकते हैं और जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की अज्ञानता को नष्ट कर कर्म करने की शक्ति दी थी, वैसे ही मरीज को गीता का ज्ञान देकर रोग से लड़ने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

गीता में रियलिटी को स्वीकार करने पर सबसे ज्यादा जोर है

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने वास्तविक स्थिति (रियलिटी) को स्वीकार करने पर सबसे ज्यादा जोर दिया है। एक श्लोक में उन्होंने कहा है कि सबसे पहला कदम यही है कि चीजें जैसी हैं, उसको उस रूप में स्वीकार करो। मानो कि हां, चीजें वैसी है, फिर उन्हें बदलने की कोशिश करो। ठीक करने की कोशिश करो, पर अगर तुम उसे उसी रूप में स्वीकार नहीं करोगे, तो वह ठीक कैसे होगा।

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