वह लड़की ऐसे सिगरेट फूंक रही थी, जैसे झांसी की रानी टाइप काम कर रही हो - धर्म संसद
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Image Courtesy: hiveminer.com

वह लड़की ऐसे सिगरेट फूंक रही थी, जैसे झांसी की रानी टाइप काम कर रही हो

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उस लड़की के हाथ में सिगरेट थी। वह हैदराबाद के उप्पल में एक चाय की दुकान पर खड़ी होकर ऐसे सिगरेट पी रही थी, जैसे ऐसा महान काम करने के बाद उसमें और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई में कोई ज्यादा अंतर नहीं रह गया हो। उसके चेहरे पर गौरव का भाव था। सड़क के किनारे चाय की दुकान पर खड़े होकर सिगरेट का कश लगाते हुए वह लड़की साड़ी या सलवार-कुर्ता पहने आस-पास से गुजर रही महिलाओं की ओर इस भावना से देख रही थी, जैसे वह कितनी आगे निकल गई और ये बेचारियां वहीं की वहीं रह गई।

उसका आत्मविश्वास से भरा चेहरा और दुकान पर सहमे लड़कों को देख हंसी आ रही थी

लड़कों से भरे उस चाय की दुकान पर उनके सामने पूरी मजबूती से खड़ी यह लड़की आत्मविश्वास से भरी हुई थी। उसका आत्मविश्वास देखकर बड़ा अच्छा लग रहा था कि देखो। आजकल की बेटियां वैसी नहीं रहीं कि लड़कों का झुंड देख सहम जाए। खुद को लड़कियों से बेहतर समझने वाले इन लड़कों की आंखों में आंखे डालकर यह लड़की उन्हें नाप रही है और वहां खड़े कुछ लड़कों की हालत खराब हुई जा रही है कि रिएक्ट करें, तो कैसे। बोलें, तो क्या। कुछ लड़कों को तो यह साहस भी नहीं हो रहा था कि उस लड़की को घूरें। लड़के दूसरी तरफ मुंह करके खुसर-फुसर कर रहे थे। कोई तेज बोल तक नहीं पा रहा था। लड़कों की यह हालत देख कर मजा भी आ रहा था, पर उस लड़की को देखकर दिमाग में कुछ सवाल भी कौंध रहे थे।

सवाल नंबर 1-

लड़की मॉडर्न कपड़ों में थी। अच्छे-भले घर की भी दिख रही थी। सुंदर भी थी, पर वह यूं चाय की दुकान पर लड़कों के बीच सिगरेट पीकर क्या साबित करना चाहती थी। दरअसल वह लड़की विद्रोह कर रही थी। वह विद्रोह कर रही थी उन तमाम प्रतिबंधों से जो लड़कियों पर थोपे जाते हैं, पर लड़कों को आजाद छोड़ दिया जाता है। सिगरेट पीते हुए उस लड़की के चेहरे पर जो गर्व था, उससे लग रहा था जैसे उसे महसूस हो रहा हो कि उसके हाथ में सिगरेट नहीं। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तलवार आ गई है और वह हर कश के साथ तलवार घूमा रही है और चाय की दुकान के लड़के सहमे हुए इधर-उधर भागे जा रहे हैं।

सवाल नंबर 2-

पर अगर लड़कों को वह लड़की यही बताना चाहती थी कि लड़कियां भी बुरे काम बिना डरे कर सकती हैं। बीच रोड नशा कर सकती हैं, तो फिर वह सिगरेट क्यों पी रही थी। उसे तो चिलम भर कर गांजा ले आना चाहिए था और वहां खड़े होकर गांजे का कश लगाना शुरू कर देना चाहिए था। तब शायद उसे तलवार वाली फीलिंग की बजाए ऐसा महसूस होता कि वह तोप चला रही है। दरअसल वह बागी लड़की जो कर रही थी, वह बगावत के धुन में की गई अव्वल दर्जे की मूर्खता थी। वह फेमिनिज्म (नारीवाद) के नाम पर हर गलत-सही वह काम करने की धुन में थी, जो लड़के करते हैं। उसके दिमाग में यह था कि जो लड़के कर सकते हैं, वह लड़कियां क्यों नहीं कर सकती।

लड़के अगर सड़क की चाय की दुकान पर सिगरेट पी सकते हैं, तो लड़कियां क्यों नहीं, पर उसने यह नहीं सोचा कि फेमिनिज्म की यह सनक उसे कहां ले जाएगी।

सवाल नंबर 3-

गलत कामों में, बेहयाई में लड़कों से प्रतिद्वंदिता (कंपीटिशन) करके क्या हो जाएगा। लड़कों से कंपीटिशन करना है। खुद को लड़कियों से बेहतर समझने वाले इन लड़कों को सबक सिखाना है, तो खूब पढ़ो। इतना पढ़ो कि कल जब कॉलेज खत्म कर असली जिंदगी शुरू हो, तो तुम उन सबकी बॉस रहो। सब तुम्हें गुड मॉनिंग बोलें। गुड इवनिंग बोले। तुमसे छुट्टी मांगें। प्रमोशन के लिए, सैलरी बढ़ाने के लिए तुम्हारे पास आकर अनुरोध करें, तो इसे फेमिनिज्म की जीत समझा जा सकता है, पर सिगरेट पीने, शराब पीने, छेड़खानी करने, रेप करने, बेशर्मी करने, बेहयाई करने में उनसे कंपीटिशन करके क्या होगा। यह तो पागलपन है। सनक है। परंपराओं से बगावत के नाम पर खुद अपना स्वास्थ्य (हेल्थ) और नैतिकता खराब कर लेने की बेवकूफी है।

आईए, अब असली झांसी की रानी से मिलवाते हैं

यह फेमिनिज्म नहीं है। फेमिनिज्म (नारीवाद) क्या है मैं बताती हूं। फेमिनिज्म का उदाहरण है वहां से 100 मीटर की दूरी पर मौजूद एक दूसरी लड़की। इस लड़की ने स्कूल ड्रेस पहन रखा है। उम्र मुश्किल से 15-16 साल है। स्कूल का लाल रिबन अब भी उसके बालों में बंधा है। वह सिगरेट पीने वाली लड़की की तरह गोरी भी नहीं है। सांवली है। उसके चेहरे पर थकान भी दिख रही है, पर वह एक साथ दो-दो काम कर रही है। वह अपनी मां के साथ मिलकर सब्जी भी बेच रही है और किताब निकाल कर पढ़ भी रही है। दुकान पर ग्राहक (कस्टमर) आया, तो फौरन वह किताब बगल में रख देती है और दुकानदार बन जाती है। जैसे ही कस्टमर जाता है, वह फिर पढ़ने में मग्न हो जाती है।

सड़क के किनारे कितना शोर-शराबा हो रहा है, पर उसे कोई परवाह नहीं है। उसकी एकाग्रचित्तता (कनसनट्रेशन) देखते बन रही है। वह पढ़ रही है, तो बस पढ़ रही है। यह फेमिनिज्म है। यह नारीवाद है। यह नारी की शक्ति है। परंपराओं, परिस्थतियों से बगावत है। इस लड़की के हाथों की कलम झांसी की रानी वाली तलवार है और उस लड़की के हाथों का सिगरेट एक गुलामी की बेड़ियां काट दूसरी गुलामी की जंजीर पहनना है। सब्जी बेच रही लड़की को वहां पास में खड़ा एक लड़का काफी देर से घूर रहा था। लड़की ने अचानक अपने तराजू का बटखारा उठाया और लड़का की तरफ तान दिया। लड़का ऐसे जान बचाकर दौड़ कर वहा से भागा जैसे उस लड़की ने बंदूक दिखा दी हो। यह भारत की रानी लक्ष्मीबाई है। यह हमारी झांसी की रानी है।

स्मोकिंग करना फेमिनिज्म नहीं है। यह तो बगावत की सनक में अव्वल दर्जे की मूर्खता है। लड़के जो करेंगे, हम वहीं करेंगे, चाहे वह हमारे लिए खराब ही क्यों न हो। यह फेमिनिज्म कैसे हो सकता है। आप तो उन्हें फॉलो कर रही हैं। उन्हें ही आदर्श मान रही हैं। वे आपको फॉलो करें। आपको आदर्श मानें, यह फेमिनिज्म हैं।

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