शंकराचार्य के शिष्यों ने उठा ली थी तलवार, किले छोड़ भागी थी अंग्रेजी सरकार - धर्म संसद
sannyasi vidroh in bihar and bengal
Aadi Shankaracharya, Image Courtesy: freepressjournal.in

शंकराचार्य के शिष्यों ने उठा ली थी तलवार, किले छोड़ भागी थी अंग्रेजी सरकार

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पूरा देश कल आजादी की 72वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। इस पावन अवसर पर हम आपको बताना चाहते हैं कि भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की लड़ाई नहीं थी, बल्कि 1763 में शंकराचार्य के शिष्यों की ओर से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिहार और बंगाल में छेड़ा गया युद्ध देश के स्वतंत्रता संग्राम का पहला युद्ध था।

1763 से शुरू होकर 1800 ईस्वी तक बिहार और बंगाल में चले शंकराचार्य के शिष्यों के सशस्त्र विद्रोह की याद दिलाना चाहते हैं। शंकराचार्य के शिष्यों का यह विद्रोह हमें बताता है कि धर्म कायर नहीं बनाता। धर्म तो आवश्यकता पड़ने पर अपने शरीर के रक्त की हर बूंद अर्पित कर देने का साहस भरता है। जब अंग्रेजों ने किसानों पर बेइंतहा जुल्म करना शुरू कर दिया। अकाल से तड़पते किसानों से लगान वसूलने के नाम पर सबकुछ लूटने लगे, तो शंकराचार्य के शिष्यों ने शंख फेंककर तलवार उठा ली और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ छापामार युद्ध शुरू कर दिया।

हजारों सन्यासियों ने वंदे मातरम कहते हुए उठा ली तलवार

शंकराचार्य के शिष्यों की यह टोली कोई सौ, दो सौ सन्यासियों की टोली नहीं थी, बल्कि इसमें हजारों सन्यासी शामिल थे। बाद में इसमें मुस्लिम फकीर भी शामिल हो गए और यह लड़ाई हिन्दू मुस्लिम एकता की भी मिसाल बन गई। प्रसिद्ध लेखक बंकिमचंद्र चटर्जी ने इसी सन्यासी विद्रोह पर आनंदमठ की रचना की थी। इस पर फिल्म भी बनी। इस फिल्म का नाम भी आनंदमठ ही था। सन्यासियों ने जब वंदे मातरम, सुजलाम, सुफलाम, मलयज, शीतलाम गाते हुए तलवारें लहरानी शुरू की, तो कई किले छोड़कर अंग्रेजों को भाग जाना पड़ा।

पूर्णिया से जलपाईगुड़ी तक फैली आग

बिहार के पूर्णिया से बंगाल के जलपाईगुड़ी तक क्रांति की ज्वाला धधक उठी। शंकराचार्य के शिष्यों ने अंग्रेजों के कई अफसर टॉमस, कैप्टन एडवर्ड आदि को मार गिराया। अंग्रेजी सेना को तहस-नहस कर डाला। कई किले, कचहरी व गोदाम लूट लिया। सन्यासियों के छापामार युद्ध के आगे अंग्रेजों की हालत इतनी खराब हो गई कि उनकी बंदूकें तलवार-भालों के सामने बेबस साबित होने लगीं। भीषण अकाल से त्राहि-त्राहि कर रहे बिहार व बंगाल के किसानों ने खुल कर सन्यासियों का साथ दिया।

अंग्रेजों ने अपनाई कुटिल नीति, सन्यासियों को दिया लुटेरा करार

अंग्रेजों को यह महसूस हो गया कि जब तक शंकराचार्य के शिष्यों को मिल रहा जन समर्थन खत्म नहीं होगा, तब तक इन्हें हराया नहीं जा सकता। इसके बाद अंग्रेजों ने कुटिल चाल चली। अंग्रेजों ने इस स्वतंत्रता सेनानी सन्यांसियों को लुटेरा करार दे दिया और यह एलान कर दिया कि जो भी इनकी सहायता करेगा, उसे सरेआम फांसी दे दी जाएगी। सन्यासियों की मदद करने वाले गांवों के किसानों को पकड़-पकड़ कर फांसी दी जाने लगी। किसानों को गुलाम बनाकर उन्हें बाजारों में बेच दिया। सन्यासियों का नेतृत्व कर रहे भवानी पाठक अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए जबकि देवी चौधरानी काफी बाद तक अंग्रेजों से लोहा लेती रहीं।

बिहार-बंगाल के मंदिर बन गए थे क्रांति के किले, भरे रहते थे हथियार

शंकराचार्य के शिष्यों की टोली ने अंग्रेजों के जुल्मों से किसानों को बचाने के लिए बिहार-बंगाल के मंदिरों को क्रांति के किले में बदल दिया था। पहाड़ों और जंगलों में बने मंदिरों में तलवार, भाले, तीर-धनुष भरे रहते थे। बाद में सन्यासियों ने कुछ बंदूकें भी जमा कर ली थी। मंदिर में भजन की जगह वंदे मातरम का गान होने लगा था। भारत माता की अराधना होने लगी थी। बंगाल के ढाका में सन्यासियों ने कंपनी की कोठी पर धावा बोल दिया और सारा माल लूटकर दाने-दाने को तरस रहे अकाल के मारे किसानों में बांट दिया।

अंग्रेजों में इस कदर भर गया था शंकराचार्य के शिष्यों का खौफ

शंकराचार्य के शिष्यों का अंग्रेजों में इस कदर खौफ भर गया कि वे दोबारा ढाका की कंपनी की कोठी पर कब्जा करने का साहस तक नहीं कर सके। पूरे छह माह तक इस विशाल कोठी पर सन्यासियों और किसानों का कब्जा रहा। छह महीने बाद अंग्रेजी सेना के अफसर विशाल सेना लेकर यहां पहुंचे और भारी रक्तपात के बाद कोठी पर दोबारा कब्जा कर सके। सन्यासियों ने राजशाही जिले के रामपुर बोआरिया की अंग्रेजों की कोठी को भी लूट लिया।

सन्यासियों ने किया था कई किलों का भी निर्माण

अंग्रेजों के इतिहासकारों ने इस युद्ध को सन्यासियों की बगावत कहा, पर यह सिर्फ सन्यासियों की बगावत नहीं थी। इसे किसानों, जुलाहों, सैनिकों का भरपूर समर्थन हासिल था। सन्यासियों की सेना ने न केवल अंग्रेजों के किलों और कोठियों को लूटा बल्कि अपने किले भी बनाए। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में अंग्रेजों ने एक किला बनाया था। महास्थान गढ़ और पौण्डवर्धन में भी किले बनाए गए थे। युद्ध के दौरान कई बार ऐसा हुआ था कि अंग्रेजों की फौज में शामिल भारतीयों ने युद्ध के समय बगावत कर दी थी और अंग्रेजी सेना का साथ छोड़कर शंकराचार्य के शिष्यों की तरफ से लड़ने लगे थे।

आनंदमठ उपन्यास ने मिटाया अंग्रेजों का लगाया कलंक

1800 इस्वी आते-आते सन्यासियों के सभी बड़े नेता शहीद हो गए और यह लड़ाई बिखर गई। अंग्रेजों ने इस बगावत को सन्यासियों का लूटमार नाम दे दिया। इस लड़ाई को गौरव दिलाने का श्रेय लेखक बंकिमचंद्र चटर्जी को जाता है। जिन्होंने शंकराचार्य के शिष्यों के इस विद्रोह पर आनंदमठ उपन्यास की रचना की। बाद में इस पर आनंदमठ नाम से ही फिल्म भी बनी।

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02 comments on “शंकराचार्य के शिष्यों ने उठा ली थी तलवार, किले छोड़ भागी थी अंग्रेजी सरकार

  • SHARAD KUMAR KAUSHAL , Direct link to comment

    आनंदमठ के आखिरी के 3 पेज पढ़िये॥ सन्यासी आंदोलन अंग्रेज़ो के खिलाफ नहीं, मुस्लिम राजाओ के खिलाफ लिखा हुआ है |

    • parmanand singh , Direct link to comment

      The Sannyasi rebellion or Sannyasi revolt (Bengali: সন্ন্যাসী বিদ্রোহ, The monks’ rebellion) were the activities of sannyasis and fakirs (Hindu and Muslim ascetics, respectively) in Bengal against the East India Company rule in the late 18th century. It is also known as the Sannyasi rebellion (সন্ন্যাসী বিদ্রোহ) which took place around Murshidabad and Baikunthupur forests of Jalpaiguri. Historians have not only debated what events constitute the rebellion, but have also varied on the significance of the rebellion in Indian history. While some refer to it as an early war for India’s independence from foreign rule, since the right to collect tax had been given to the British East India Company after the Battle of Buxar in 1764, others categorize it as acts of violent banditry following the depopulation of the province in the Bengal famine of 1770.

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