BHU प्रोफेसर डॉ कमलेश का बड़ा रहस्योद्घाटन, बिहार में इस जगह हुआ था समुद्र मंथन - धर्म संसद
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BHU प्रोफेसर डॉ कमलेश का बड़ा रहस्योद्घाटन, बिहार में इस जगह हुआ था समुद्र मंथन

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बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के प्रोफेसर और संस्कृत के प्रकांड विद्वान डॉ कमलेश झा ने बड़ा रहस्योद्घाटन किया है। डॉ कमलेश झा ने बताया है कि जहां देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, वह स्थान बिहार में है। प्रो डॉ कमलेश झा बताते हैं कि बिहार के बेगूसराय का सिमरिया ही वह स्थान है, जहां समुद्र मंथन हुआ था। डॉ कमलेश झा बताते हैं कि उस समय सागर की सीमा सिमरिया से गंगासागर तक थी। सिमरिया में ही समुद मंथन हुआ था और यहीं से अमृत निकला था। इसलिए बिहार के बेगूसराय के सिमरिया को आदिकुंभ स्थली कहा जाता है। कुंभ की शुरुआत सिमरिया घाट से ही हुई है। याज्ञवल्क्यजी मिथिला नरेश राजा जनक के गुरु थे। याज्ञवल्क्यजी और महान ऋषि भारद्वाजजी भारत के विभिन्न स्थानों पर जाकर धर्म की व्याख्या और विश्लेषण किया करते थे।

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BHU प्रोफेसर डॉ कमलेश

25 अक्टूबर को होगा सिमरिया में कुंभ का ध्वजारोहण

यह बात हर कोई जानता है कि इलाहाबाद, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है। इलाहाबाद में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम के किनारे, हरिद्वार में गंगा के किनारे, उज्जैन में शिप्रा के किनारे और नासिक में गोदावरी के किनारे कुंभ का आयोजन होता है, पर यह बात बहुत ही कम लोगों को पता है कि आदिकुंभ स्थली हरिद्वार, इलाहाबाद, नासिक और उज्जैन नहीं, बल्कि बिहार का सिमरिया है, पर इतिहास के पन्ने में सिमरिया का महत्व धीरे-धीरे लुप्त होता चला गया। सिमरिया के महत्व को फिर से लोगों तक पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। 25 अक्टूबर को सिमरिया में कुंभ का ध्वजारोहण होगा।

रामायण में है इसका जिक्र

रामायण में भी बिहार के सिमरिया में समुद्रमंथन होने का जिक्र है। रामायण में बताया गया है कि जब गुरु  विश्वामित्र भगवान राम और लक्ष्मण को लेकर राजा जनक की सभा में जा रहे थे, तो गुरु विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा कि देखो राम, यही वह स्थान है, जहां कभी समुद्रमंथन हुआ था और अमृत की प्राप्ति हुई थी।

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मिथिला, जहां का नौकर भी था इतना आदर्शवान

प्रोफेसर डॉ कमलेश झा कहते हैं कि मिथिला राजा जनक की तपस्या की धरती है। माता सीता की धरती है। मिथिला के लोगों ने ही सबसे पहले राम-सीता की जोड़ी के दर्शन किए थे और यह धरती और भी धन्य हो गई थी। और भी पवित्र हो गई थी। प्रसंग है कि जब भगवान श्रीराम माता सीता के साथ मिथिला से विदा होने लगे, तो उन्होंने अपनी बहुत सेवा करने वाले सेवक से कहा कि तुमने मेरी बहुत सेवा की है। कुछ मांगो।

मिथिला के नौकर भी कितने आदर्शवान थे कि सेवक ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। भगवान राम से कहा कि आप यहीं वर दें कि मिथिला का उच्चारण करते ही पाप नष्ट हो जाए। यह धरती धर्म की धरती रहे। यहां आने वालों को मोक्ष मिले। जहां के सेवकों में भी खुद के लिए सुख-संपत्ति पाने की इच्छा से ज्यादा लोककल्याण की इच्छा हो, वह धरती है मिथिला।

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प्रो कमलेश झा कहते हैं कि राजा जनक के पास पूरे संसार से बड़े-बड़े विद्वान अपने प्रश्नों का उत्तर पाने मिथिला आते थे। जिसे प्रश्नों का कहीं उत्तर नहीं मिलता था, वह राजा जनक के पास मिथिला आ जाता था। इसका जिक्र उपनिषेदों में भी है। महान ऋषि व्यास अपने पुत्र सुखदेव को धर्म की शिक्षा दे रहे थे, पर सुखदेव ने जब अपने पिता ऋषि व्यास से पूछा कि ममता क्या है और इसका त्याग क्यों और कैसे करना चाहिए, तो व्यासजी ने सुखदेवजी को कई प्रकार से यह बात समझाने का प्रयास किया, पर सुखदेवजी संतुष्ट नहीं हुए, तब व्यासजी ने कहा कि पुत्र, मुझे लगता है कि अब इस संसार में एक ही व्यक्ति ऐसे हैं, जो तुम्हें संतुष्ट कर सकते हैं और वे हैं राजा जनक।

तुम उनके पास मिथिला चले जाओ और उनसे अपने प्रश्नों का उत्तर पूछो। पिता की आज्ञा से सुखदेवजी मिथिला पहुंचे और राजा जनक से पूछा कि ममता क्या है और इसका त्याग क्यों और कैसे करना चाहिए। राजा जनक ने कहा कि आप एक माह मिथिला में ठहरिए। आपको उत्तर मिल जाएगा। व्यासजी एक माह मिथिला के पर्णकुटीर में रहे। एक दिन जब वे राजा जनक के दरबार में थे, तो उसी समय सेवक ने आकर कहा कि जिस पर्णकुटीर में सुखदेवजी रहते हैं, वहां आग लग गई। यह सुनते ही सुखदेवजी पर्णकुटीर की ओर दौड़ पड़े। वहां उनका लंगोट रखा हुआ था।

जब उन्होंने देखा कि मेरा लंगोट सही-सलामत है, तो उन्हें राहत महसूस हुई और वे लंगोट के साथ वापस राजा जनक के दरबार में पहुंचे। तब राजा जनक ने उन्हें समझाया कि यही ममता है। आपकी ममता लंगोट से है। किसी वस्तु से जुड़ जाना, आसक्त हो जाना ही ममता है और आसक्ति से बंधन होता है। बंधन से मुक्त होने के लिए पहले हर तरह की आसक्ति से मुक्त होना पड़ता है।

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प्रोफेसर कमलेश झा के बारे में जानें

डॉ कमलेश झा संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं। वे बीएचयू में प्रोफेसर हैं। कमलेश झा बिहार के समस्तीपुर जिले के हसनपुर चीनी मिल अनुमंडल के पटसा गांव के रहने वाले हैं। कमलेश झा के पिता का नाम पंडित श्री भवनाथ झा और माता का नाम स्वर्गीय बच्चा देवी है। उनके दादाजी आचार्य रामेश्वर झा देश के बड़े संस्कृत विद्वानों में एक थे। आचार्य रामेश्वर झा ने अपना पूरा जीवन संस्कृत के प्रचार-प्रसार में लगा दिया। कमलेश झा पर आचार्य रामेश्वर झा का बड़ा प्रभाव पड़ा। रामेश्वर झा के अलावा आचार्य रामसेवक झा, आचार्य देवस्वरूप मिश्र, आचार्य रामप्रसाद त्रिपाठी, आचार्य पारसनाथ द्विवेदी, आचार्य नरेंद्र नाथ पांडेय और काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष आचार्य रामयत्न शुक्ल का भी बड़ा प्रभाव पड़ा। कमलेश झा की पत्नी डॉ मंदोदरी भी संस्कृत की विद्वान हैं और कमलेश झा अपनी सफलता का पूरा श्रेय डॉ मंदोदरी को देते हैं।

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