कृष्ण ने जब रुकवाई थी इन्द्र की पूजा तो उनका भी हुआ था कड़ा विरोध, ना डरें विरोध से - धर्म संसद
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कृष्ण ने जब रुकवाई थी इन्द्र की पूजा तो उनका भी हुआ था कड़ा विरोध, ना डरें विरोध से

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दशहरा चला गया। बुराइयों के प्रतीक रावण के ऊंचे-ऊंचे पुतले जलाए गए, पर रावण अब बहुत चालाक हो गया है। रावण अब धर्म का ठेकेदार बन गया है। उसके अब दस सिर भी नहीं दिखते। मायावी रावण ने रूप बदल लिया है। वह कहीं धर्मगुरु बन गया है, तो कहीं धर्म का ठेकेदार। धर्मगुरु और धर्म का ठेकेदार बन वह ऐसे-ऐसे घृणित काम कर रहा है, जैसा रावण ने भी कभी नहीं किया।

पति-पत्नी की बेडशीट मांगते थे धर्म के ठेकेदार

महाराष्ट्र के पुणे के पिंपरी के भाटनगर में धर्म के ठेकेदार रावणों ने यह कुप्रथा बना रखी है कि जिस भी युवक-युवती की शादी होगी, वे सुहागरात के दूसरे दिन अपने बेड की बेडशीट सुबह में ले जाकर धर्म के ठेकेदारों को दिखाएंगे और बेडशीट देखने के बाद धर्म के ठेकेदार यह बताएंगे कि उनकी शादी मान्य है या नहीं।

इस जोड़े ने किया इस कुप्रथा का विरोध, मिली यह सजा

पुणे के पिंपरी के भाटनगर में यह कुप्रथा धर्म का रूप लेकर पता नहीं कब से धर्म के ठेकेदारों की ओर से चलाई जा रही है, पर इसका विरोध करने का साहस नए जमाने के पढ़े-लिखे युवा भी नहीं कर पा रहे थे। वे इस अधर्म को धर्म और भगवान से जोड़कर देख रहे थे और हर युवक शादी के बाद बेडशीट लेकर धर्म के ठेकेदारों के पास पहुंच जाता था, पर एक वीरांगना युवती ने इसका विरोध किया। इस युवती ने अपने पति को समझाया कि यह कौन सा धर्म है कि शादी की सुबह बेडशीट लेकर धर्म के ठेकेदारों के पास जाओ और उनसे शादी के पवित्र होने का सर्टिफिकेट लो।

पति-पत्नी ने इसका विरोध किया और बेडशीट लेकर धर्म के ठेकेदारों के पास नहीं गए। इसके बाद धर्म के ठेकेदारों का अहंकार रावण के अहंकार से भी ऊपर चला गया। धर्म के ठेकेदारों ने इन्हें कई तरह से अपमानित किया। इनका सामाजिक बहिष्कार करने का एलान कर दिया। इन्हें सामाजिक कार्यक्रमों से निकाल दिया गया, लेकिन वीरांगना ने हार नहीं मानी और धर्म के इन ठेकेदारों के खिलाफ पुलिस से शिकायत की। पुलिस ने इन धर्म के ठेकेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली और अब ये भागे-भागे फिर रहे हैं।

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भगवान श्रीकृष्ण व बुद्ध से सीखें

यह घटना कोई अकेली ऐसी घटना नहीं है। देश के हर क्षेत्र में धर्म के नाम पर अधर्म हो रहा है। कुप्रथाओं को धार्मिक मान्यताओं का रूप दे दिया गया है। धर्म के आधार पर भेदभाव को भगवान का नाम लेकर सही करार देने की कोशिश की जा रही है, जबकि भगवान श्रीकृष्ण और भगवान बुद्ध ने लगातार ऐसी कुप्रथाओं के खिलाफ संघर्ष किया और धर्म व समाज के कथित ठेकेदारों के खिलाफ जाकर इन्हें बदला।

भगवान श्रीकृष्ण ने बंद करवा दी थी इंद्र समेत सभी देवताओं की पूजा

भगवान श्रीकृष्ण ने कुप्रथाओं को कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने हमेशा कुप्रथाओं के खिलाफ संघर्ष किया। भगवान श्रीकृष्ण जब किशोर थे, तभी उन्होंने देखा कि बृज में इंद्रोत्सव का आयोजन किया जाता है। इसमें इंद्र और दूसरे देवताओं के नाम पर चढ़ावा चढ़ाया जाता है। उनकी स्तुति की जाती है। बृजवासी अपनी मेहनत की कमाई इंद्रोत्सव पर हर साल खर्च कर देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि हमारे भगवान तो गो माता हैं और गोवर्धन पर्वत हैं, जिनसे निकला जल हमें हरा-भरा रखता हैं।

हम गो माता की सेवा करते हैं, उसी से पुण्य मिलता है। हम गो माता और गोवर्धन पर्वत की पूजा करेंगे। इंद्र या किसी और देवी-देवता की पूजा क्यों करें। उनके समझाने पर पूरे बृज में इंद्रोत्सव बंद हो गया और गो पूजा और गोवर्धन पूजा शुरू हो गई। पुराणों में कहा गया है कि पूजा बंद होने से क्रोधित होकर इंद्र ने घनघोर बारिश शुरू कर दी, पर भगवान कृष्ण ने अपनी एक ऊंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर बृजवासियों की रक्षा की और इंद्र का अभिमान चूर-चूर कर दिया।

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तब से बंद हो गई इंद्र की पूजा

तब से कभी कहीं भी इंद्र की पूजा नहीं होती। जैसे हमारे भगवान श्रीकृष्ण कुरीतियों से लड़े थे, वैसे ही हमें भी धर्म के ठेकेदारों और कुप्रथाओं से लड़ना होगा, तभी धर्म बचेगा। यही ईश्वर का मार्ग है। यही श्रीकृष्ण का मार्ग है। साथ ही अगर हम लड़ नहीं रहे, तो कम से कम जो लड़ रहा हो, उसका सहयोग और समर्थन तो जरूर करें।

बुद्ध ने बंद करवाई बलि की प्रथा

भगवान बुद्ध के काल में बलि की प्रथा चरम पर हो गई थी। मंदिरों में मूक-निर्दोष पशुओं की ईश्वर को प्रसन्न करने के नाम पर बलि दी जाती थी। भगवान बुद्ध ने इस पर सवाल उठाया और बलि की प्रथा को बंद करवाने के लिए पहल की। उनकी इस पहल का जमकर विरोध हुआ, पर आखिरकार बुद्ध ने काफी हद तक बलि की प्रथा पर विराम लगाने में सफलता हासिल की।

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