रोज होता था गैंगरेप, सबने किया सुसाइड, उसने लड़कर जीता नोबेल प्राइज - धर्म संसद
nadia murad
Nadia Murad, Image Courtesy: thenational.ae

रोज होता था गैंगरेप, सबने किया सुसाइड, उसने लड़कर जीता नोबेल प्राइज

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उसका नाम नादिया मुराद है। वह यजीदी है। यजीदी सूर्य के उपासक होते हैं। वे इराक और तुर्की के अल्पसंख्यक हैं। इनका पुनर्जन्म और मोक्ष में विश्वास है। यजीदी मर जाते हैं, पर अपना धर्म नहीं छोड़ते। सीरिया और इराक का आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) इनसे नफरत करता है।

2014 में आईएस ने हजारों यजीदियों का कत्ल कर दिया और उनकी बेटियों-बहुओं को घरों से उठाकर अपने आतंकी कैंप में ले आए। इन्हें सेक्स स्लेव (सेक्स गुलाम) बना दिया। ऐसी ही एक सेक्स स्लेव थी नादिया मुराद। हर दिन आतंकियों का झुंड उससे तब तक रेप करता था, जब तक वह बेहोश नहीं हो जाती थी। अगले दिन फिर उसके साथ वही दरिंदगी होती थी। वह अकेली नहीं थी, जिसके साथ यह सब हो रहा था। सैकड़ों यजीदी लड़कियों ने रोज की इस दरिंदगी से तंग आकर सुसाइड कर लिया, पर धर्म नहीं बदला।

हर बार करती रही भागने की कोशिश, मिलती थी यह सजा

नादिया मुराद ने न धर्म बदला और न सुसाइड किया। वह हर दिन मौका ढूंढ़ती रही। सूर्य से प्रार्थना करती रही कि यहा से निकल भागने का बस एक मौका मिल जाए। उसे एक दिन मौका मिला। आतंकियों की गलती से एक दिन उसके कमरे का दरवाजा खुला रह गया। वह निकल भागी और दौड़ती रही। दौड़ती रही। उसे कोई होश नहीं था।

एक दिन मिली मुक्ति, फिर लड़ी सबकी लड़ाई

किसी तरह भागती, खुद को बचाती, वह इराक के मोसुल शरणार्थी कैंप पहुंच गई। वहां उसे नया जीवन मिला। नरक से मुक्ति मिली, पर कोई व्यक्ति महान तब बनता है, जब वह सिर्फ अपने लिए नहीं दूसरों की मुक्ति, दूसरों की खुशहाली के बारे में सोचते है। नादिया ने भी वही किया। वह यौन उत्पीड़न की शिकार दूसरी महिलाओं के लिए काम करने लगी। उनका जीवन बचाने और उनके तहस-नहस जीवन को फिर से संवारने में जुट गई।

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उसकी नजरों के सामने उसके छह भाइयों को मार डाला

नादिया की आंखों के सामने उसके छह भाइयों को आईएस आतंकियों ने काट डाला था। नादिया की मां को दरिंदों ने ऐसी खौफनाक मौत दी थी कि शैतान भी कांप जाए। आईएस आतंकियों ने नादिया की मां को इसलिए मार डाला था क्योंकि उन्हें लगा कि वह सेक्स स्लेव बनाने के लायक नहीं है। उसके पूरे परिवार को मार कर आतंकी नादिया और उसकी बहन को अपने कैंप में ले आए थे।

मात्र 25 वर्ष की है नादिया

नादिया मुराद की उम्र महज 25 वर्ष है। उसका जन्म 1993 में हुआ था। नादिया को नोबेल शांति पुरस्कार मिला है। पूरे इतिहास में मलाला यूसुफजई को छोड़कर इतनी कम उम्र में नोबेल पुरस्कार किसी को नहीं मिला। नादिया अब जर्मनी में रहती हैं। वह मानवाधिकारों के लिए लड़ती हैं। वह नोबेल पुरस्कार पाने वाली पहली इराकी है। इराक से उन्हें जर्मनी में शरण मिली थी।

बनाया ‘नादिया इनीशिएटिव’

नादिया ने ‘नादिया इनीशिएटिव’ नाम से एक संस्था बनाई। यह संस्था दुनिया भर में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के खिलाफ लड़ती है। आवाज उठाती है। नादिया अब सिर्फ इराक के यजीदी महिलाओं की लड़ाई नहीं लड़ती। वह दुनिया भर के पीड़ित महिलाओं की लड़ाई लड़ती है। वह मानव तस्करी के खिलाफ भी लड़ाई लड़ती है। वह यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं से कहती हैं कि सताए जाने का मतलब सुसाइड नहीं है। जिंदगी फिर से शुरू करो। मरो नहीं लड़ो।

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कई बार मिली धमकियां, पर डरी नहीं नादिया

यजीदी लड़कियों को ऑनलाइन बेचने वाले आईएस शैतानों ने उनके चंगुल से निकल भागने के बाद भी नादिया को धमकाने की कोशिश की। उसे अपनी आवाज बंद रखने की धमकी दी, पर नादिया पर इन धमकियों का कोई असर नहीं हुआ।

न्यूयार्क में किया एलान

नादिया ने न्यूयार्क में सितंबर 2016 में ‘नादिया इनीशिएटिव’ नाम की संस्था बनाने का एलान कर दिया। तीन मई, 2017 को नादिया वेटिकन सिटी गईं और उनकी मुलाकात पोप फ्रांसिस से हुई। तब नादिया ने पोप से कहा कि अब भी सैकड़ों यजीदी आईएस आतंकियों के कैंपों में रोज दरिंदगी झेल रहे हैं। आप उनके लिए कुछ कीजिए। उन्हें बचाने के लिए कुछ कीजिए। नादिया ने जितनी बार अपनी कहानी सुनाई। उतनी बार उसकी आंखों से झर-झर आंसू बहाए, पर नादिया एक क्षण के लिए रुकी नहीं।

पोप को पीछे छोड़ जीता नोबेल प्राइज

आश्चर्यजनक यह है कि जिन पोप फ्रांसिस से वेटिकन जाकर नादिया ने मदद मांगी, नादिया ने उन्हीं को पीछे छोड़कर 2018 का नोबेल शांति पुरस्कार हासिल किया। 2018 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए जिन नामों पर विचार किया गया था, उनमें पोप फ्रांसिस का नाम भी शामिल था। नादिया कुछ किताबें भी लिख रही हैं। नादिया बताती है कि उसने कई बार भागने की कोशिश की थी, पर हर बार उसे पकड़ लिया जाता था और आतंकियों के ‘धर्म कोर्ट’ में पेश किया जाता था। फिर सजा के तौर पर उसके साथ छह गार्ड गैंगरेप करते थे, पर वह भागने की कोशिश करती रही और एक दिन वहां से निकल भागने में सफल हो गई। नादिया का जीवन यह सिखाता है कि कितनी भी बड़ी मुसीबत आए, सुसाइड नहीं बल्कि अंत-अंत तक लड़ाई ही विकल्प है। घने अंधकार में भी कभी अचानक रोशनी चमक सकती है।

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