डॉटर्स डे: यहां दो दिन उपवास कर भगवान सूर्य से मांगी जाती है रुठने वाली बिटिया - धर्म संसद
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Image Courtesy: Getty Images

डॉटर्स डे: यहां दो दिन उपवास कर भगवान सूर्य से मांगी जाती है रुठने वाली बिटिया

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आज डॉटर्स डे है। बेटियों का दिन। बेटियों को लाड-प्यार करने और बेटियों के बिना परिवार को अधूरा मानने के मामले में बिहार के गांव भी देश के बड़े शहरों की सोच से आगे रहे हैं। पूर्वांचल के महापर्व छठ में भगवान सूर्य की आराधना करते हुए एक गीत गाया जाता है। दो दिन उपवास करने के बाद छठव्रती महिलाएं भगवान सूर्य से कुछ मनोकामना मांगती हैं। इन मनोकामनाओं में एक है। ‘रुनकी-झुनकी बेटी मांगीला, पढ़ल-पंडितवा दामाद छठी मइया, दर्शन दिहूं न अपान’(हे छठी माता, हे भगवान सूर्य, मैंने दो दिनों तक आपकी आराधना की।

व्रत किया। पानी भी नहीं पिया। अब मेरी मनोकामना पूर्ण करें, प्रभु। मुझे एक रुठने वाली, जिद करने वाली प्यारी सी बिटियां दें। जिससे हमारा घर खुशियों से भरा रहे। हे भगवान सूर्य, मेरे इस कठिन व्रत, मेरी प्रार्थना, मेरी पूजा का यह आशीर्वाद भी दें कि जब मेरी बेटी बड़ी हो जाए, तो उसका विवाह एक संस्कारी और विद्वान व्यक्ति से हो, हे भगवान भाष्कर, अगर मैंने आपकी आराधना, पूरी पवित्रता और मन से की है, तो मेरी यह मनोकामना जरूर पूरी करें।)

यह गीत सैकड़ों वर्षों से भगवान सूर्य के महापर्व छठ व्रत पर गाया जाता है। यह गीत तब भी गाया जाता था, जब दुनिया में डॉटर डे का कंसेप्ट भी नहीं रहा होगा। बिहार का एक और लोकगीत है। यह गीत पापा और बेटी के संबंध को इतने भावुक तरीके से बयां करता है कि इसे सुनने के बाद शायद ही कोई पिता अपने आंसुओं को रोक पाए। एक बेटी इस तरह यह गीत अपने पापा को याद करते हुए गाती है।

यह गीत है-

चंदा मामा अरे आवअ, चंदा मामा बरे आवअ। (चंदा मामा, आओ, चंदा मामा आओ)

नदियां किनारे से बोलवअ हल पापाजी। (नदी किनारे से आप बुलाते थे पापा)

सोने के कटोरियां में दूध-भात ले हलअ। (सोने की कटोरी में दूध-चावल लेकर)

कोरे-कोरे करके खिलावअ हलअ पापाजी। (अपने हाथ से मुझे खिलाते थे आप पापा)

जब हम छोटा हली, धूली-माटी खेल हली। (जब मैं छोटी थी, मिट्टी में खेलती थी)

चंदन समझके धुली झार हलअ पापाजी। ( मेरे कपड़े में लगी मिट्टी भी आपके लिए चंदन जैसी रहती थी, आप उसे मेरे कपड़ों से कितने प्यार से हटाते थे पापा)

बेटबो से बढ़के दुलारअ हलअ पापाजी। (आप मुझे बेटों से भी बढ़कर प्यार करते थे पापा)

जब हम होईली पापा, 18 बरसके। ( पर, जैसे ही मैं 18 साल की हो गई)

देश-देशए वर खोजे चलअ हलअ पापाजी। (आपको मेरी शादी की चिंता होने लगी और आप इस शहर से उस शहर मेरे लिए लड़का ढूंढ़ने लगे पापा)

अंखिया के कांटा बनाए देल पापाजी। (आपने मुझे एकदम से आंख का काटा बना दिया पापा, जैसे मेरे घर में रहने से आपको कोई दिक्कत हो रही हो)

अगर यह गीत पढ़कर आपकी आंखों में आंसू आ गए हैं, तो यह गीत पढ़िए। आंसुओं से भरी आपकी आंखों में मुस्कुराहट आ जाएगी। आप बिना हंसे नहीं रह पाएंगे। यह गीत भी एक बेटी ही गा रही है।

यह गीत है।

कुर्सी बैठल बेटी मुस्कहई गे माई। (कुर्सी पर बैठकर बेटी मुस्कुरा रही है)

आज पापा नौकर खरीद अइलन गे माई। (ओ मां, आज मेरे पापा मेरे लिए नौकर खरीद कर लौटे हैं)

कुर्सी बैठल दूल्हा ठुनकअ हइ गे माई। (दूसरी तरफ अपने घर में लड़का कुर्सी पर उदास बैठा है)

आज पापा हमरा के बेच देलन गे माई। ( ओ मां, आज मेरे पापा मुझे बेच दिए। अब मुझे पूरी जिंदगी उस लड़की की बातें माननी होंगी।)

नवरात्रा के मौके पर भी देवी मां के मंदिर में जब बिहार में महिलाएं आराधना करती हैं, तो प्रार्थना और पूजा के बाद जो गीत गाते हुए मन्नत मांगती हैं। इन गीतों में देवी मां से एक प्यारी सी बिटियां भी मांगी जाती है। महिलाएं कहती हैं कि हे देवी माता। मुझे एक बिटिया जरूर देना। बिना बिटियां, घर सूना रहेगा। बिना बिटियां घर में खुशी कहां से आएगी। भले ही घर में पांच बेटे हों, पर जब तक परिवार में बेटी नहीं होगी, परिवार पूरा नहीं होगा माता। इसलिए हे मां, अगर मैंने आपकी आराधाना पूरे मन से की है, तो मुझे बिटिया जरूर देना।

लोकगीत सिर्फ गीत नहीं होते। ये संस्कृति का हिस्सा होते हैं। किसी समाज और क्षेत्र का लोकगीत उस क्षेत्र और समाज की सोच बयां करता है। बेटियों को लेकर बिहार के ये लोकगीत बताते हैं कि बेटियों को बिहार कितना सम्मान देता है और बेटियों को लेकर बिहार की सोच कितनी आगे रही है। हैप्पी डॉटर्स डे।

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